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सड़कों पर हम अक्सर पागलों को घूमते देखते हैं। न उन्हें कपड़े की सुध रहती है, न वातावरण की। अपनी हीं दुनिया में खोये रहते है। अजीबोगरीब हरकतें भी करते हैं। अपने आप से हीं बातें करते रहते हैं। कुछ लोग उन्हें देख कर हँसते भी हैं, पर कुछ लोग उनकी बदनसीब ज़िन्दगी के ऊपर तरस भी खाते हैं। कुछ इनपर ध्यान हीं नहीं देते और बच कर निकल जाते हैं। ............ इन पागलों को अनेक रूपों में आपने भी जरुर देखा होगा। ये पागल शायद कभी चैन में नहीं रहते। सतत बेचैनी इन्हें घेरे रहती है। इधर उधर भटकते रहना उनकी नियति हो जाती है। सड़े गले जूठन को भी वे खा लेते हैं। गर्मी में शरीर पर कम्बल लादे और जाड़े में नंग-धड़ंग ठिठुरते भी हम इन्हें देख सकते हैं। कुछ तो पीठ पर गंदे-संदे बेकार की चीजों का बड़ा सा भारी गठ्ठर भी लिए चलते हैं। ............ पागल आदमी का चित्त चौबीसों घंटे सिर्फ दर्द हीं झेलता रहता है। दुभाग्य यह है कि अपने हीं दर्द की इन्हें सुध नहीं रहती। अपने दर्द की यदि उन्हें सुध होती तो वे भी डाक्टरों की पास जाते और डाक्टर से कहते की मेरा दर्द मिटाओ। किन्तु वे कभी नहीं जान पाते कि उन्हें डाक्टर की जरुरत भी है। यही एक मात्र ऐसी बीमारी है, जिसमें बीमार को अपनी बीमारी का हीं होश नहीं रहता। इस लिए मैं इस बीमारी को सबसे बड़ी बीमारी मानती हूँ। कैंसर और एड्स से भी ज्यादा ख़राब। ............ पागलपन को कुछ लोग एक रहस्य मान बैठते हैं। किन्तु आज यह पूरी तरह ज्ञात हो चुका है कि पागलपन भी दूसरी बिमारियों की तरह एक रोग है, जिसका सफलता पूर्वक इलाज हो सकता है। ........... सड़क पर जो पागल घूमते दीखते हैं, दरअसल उनके परिवार वाले उनका इलाज नहीं कराते बल्कि उन्हें यूं हीं आवारा पशु की तरह छोड़ देते हैं। सड़कों पर और स्टेसनों आदि पर घूमती पागल महिलाओं की नियति तो और भी दर्दनाक होती है। कुछ नीच लोग ऐसी महिलाओं को गर्भवती भी बना देते हैं। ............. पागलपन एक प्रकार का मनोरोग है। इस रोग का इलाज करने वाले चिकित्सक भी लगभग हर शहर में आपको मिल जायेंगे। मगर चुकी इस रोग का इलाज थोड़ा जटिल होता है तथा काफी लम्बा होता है, अतः बहुत सारे लोग बीमार व्यक्ति का सही ढंग से इलाज नहीं करा पाते। ............ अंत में मुझे सिर्फ इतना हीं कहना है कि पागल व्यक्तिओं के दर्द को हम महसूस करें और उन्हें मनो चिकित्सकों तक पहुँचाने में मदत करें। 
पहले दामिनी...फिर गुड़िया...फिर आने वाले कल में ...कोई और ?चाणक्य ने कहा है-यदि राजा अपने देश में...राज्य की रक्षा...प्रजा की सुरक्षा...प्रजा पर होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाने में...और दोषियों को दंड देने में असमर्थ हो...तो प्रजा को स्वयं के हित के लिए किसी कुशल राजा की पुनः नियुक्ति के विषय में भी विचार कर लेना चाहिए !
मेरे ब्लाग पर आप सबका हार्दिक स्वागत है, शीघ्र ही नयी पोस्ट प्रस्तुत करुंगा साहित्‍य और संगीत दोनों ही आत्‍मा को शुद्ध करते हैं, आपको अनुशासित रखते हैं और आपको भावनात्‍मक रूप से मजबूती भी प्रदान करते हैं । आइए, ऐसे ही कुछ विचार मेरे साथ बांट कर देखिए, अच्‍छा लगे तो ठीक, अच्‍छा न लगे तो आपकी इच्‍छा ।