आपने भी पढ़ा होगा इस तरह की पंक्तियों को, कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, एक बिहारी सौ पे भारी, जय मराठा, गर्व से कहो हम भारतीय हैं, आदि, आदि। ............... अब यह सोंचने की बात है कि यदि कोई कहेगा की मैं सौ पर भारी हूँ, तो कोई दूसरा ऐसा तो कह हीं सकता है न, कि भैया, मैं तो हज़ार पर भारी हूँ। पुनः किसी हिन्दू को यदि हिन्दू होने पर गर्व है, तो किसी को मुस्लिम या इसाई या सिख होने पर भी गर्व होना कोई अचरज की बात नहीं होगी। .............. मेरा कहना सिर्फ यह है की हमने धरती को और मनुष्यों को न जाने कितने टुकड़ों में बाँट रखा है। जबकि यहबाँटना हकीक़त में सम्भव हीं नहीं है। पूरी धरती एक है और पूरी मनुष्यता एक है। ............. यदि हमें गर्व हीं करना है तो दो बातों का गर्व हम कर सकते हैं। पहला यह कि हम इस सुन्दरता से परिपूर्ण धरती के वासी हैं, और दूसरा यह, कि हम इस धरती के सबसे विकसित प्राणी मनुष्य की संतान हैं। ............ हमारेशास्त्रों ने इसीलिए हजारों वर्षपहले हीं "वसुधैव कुटुम्बकम" की बात की थी।
मेरे ब्लाग पर आप सबका हार्दिक स्वागत है, शीघ्र ही नयी पोस्ट प्रस्तुत करुंगा साहित्य और संगीत दोनों ही आत्मा को शुद्ध करते हैं, आपको अनुशासित रखते हैं और आपको भावनात्मक रूप से मजबूती भी प्रदान करते हैं । आइए, ऐसे ही कुछ विचार मेरे साथ बांट कर देखिए, अच्छा लगे तो ठीक, अच्छा न लगे तो आपकी इच्छा ।









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