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लागातार विरोध आन्दोलन के बावजूद महिलाओँ व युवतियो के खिलाफ हिंसा व दुष्कर्म की घटनाएं घट रही है . हमारे समाज को क्या हो गया है ? क्या लोगो की बुध्दी भ्रष्ट हो गई हो क्यो वे चोचना भुल गय है रिश्ते नाते भुल गय है या वे ऐ भुल गय है की वे भारत के उन महान व्यक्तीयो के धरती पे निवास करते है जहाँ ...बुध्द , माहाविर ,नानक ,कबिर ,दयानंद ,विवेकान्द एवम रामकृष्ण समेत अन्य महानपुरूषो की जन्मस्थल पर हम निवास करते है क्या हम यह भुल गय है? या इनके उपदेश का असर हमारे समाज पर नही रह गया ? कई सवाल है । रावण बध को उत्सुकता के साथ देखनेवाली आंखे क्या पथर हो गयी है? क्या हमारे अन्दर के मानवीय विचार और संवेदना सुन्य हो गइ है ? सामुहीक सोच ,सामुहीक पहल के साथ सोचना होगा समाज को क्या धोखा ,विश्वाघात और भ्रष्ट तौर तरिके से अर्जित धन और आवारा पूंजी का प्रभाव इसके लिए जिम्मेवार नही है? नही तो क्या कारण है कि देवी देवताओँ और माता की पुजा -अर्चना करने वाले हाथ हिंसा और दुष्कर्म करने के लिए बढ जाते है
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सड़कों पर हम अक्सर पागलों को घूमते देखते हैं। न उन्हें कपड़े की सुध रहती है, न वातावरण की। अपनी हीं दुनिया में खोये रहते है। अजीबोगरीब हरकतें भी करते हैं। अपने आप से हीं बातें करते रहते हैं। कुछ लोग उन्हें देख कर हँसते भी हैं, पर कुछ लोग उनकी बदनसीब ज़िन्दगी के ऊपर तरस भी खाते हैं। कुछ इनपर ध्यान हीं नहीं देते और बच कर निकल जाते हैं। ............ इन पागलों को अनेक रूपों में आपने भी जरुर देखा होगा। ये पागल शायद कभी चैन में नहीं रहते। सतत बेचैनी इन्हें घेरे रहती है। इधर उधर भटकते रहना उनकी नियति हो जाती है। सड़े गले जूठन को भी वे खा लेते हैं। गर्मी में शरीर पर कम्बल लादे और जाड़े में नंग-धड़ंग ठिठुरते भी हम इन्हें देख सकते हैं। कुछ तो पीठ पर गंदे-संदे बेकार की चीजों का बड़ा सा भारी गठ्ठर भी लिए चलते हैं। ............ पागल आदमी का चित्त चौबीसों घंटे सिर्फ दर्द हीं झेलता रहता है। दुभाग्य यह है कि अपने हीं दर्द की इन्हें सुध नहीं रहती। अपने दर्द की यदि उन्हें सुध होती तो वे भी डाक्टरों की पास जाते और डाक्टर से कहते की मेरा दर्द मिटाओ। किन्तु वे कभी नहीं जान पाते कि उन्हें डाक्टर की जरुरत भी है। यही एक मात्र ऐसी बीमारी है, जिसमें बीमार को अपनी बीमारी का हीं होश नहीं रहता। इस लिए मैं इस बीमारी को सबसे बड़ी बीमारी मानती हूँ। कैंसर और एड्स से भी ज्यादा ख़राब। ............ पागलपन को कुछ लोग एक रहस्य मान बैठते हैं। किन्तु आज यह पूरी तरह ज्ञात हो चुका है कि पागलपन भी दूसरी बिमारियों की तरह एक रोग है, जिसका सफलता पूर्वक इलाज हो सकता है। ........... सड़क पर जो पागल घूमते दीखते हैं, दरअसल उनके परिवार वाले उनका इलाज नहीं कराते बल्कि उन्हें यूं हीं आवारा पशु की तरह छोड़ देते हैं। सड़कों पर और स्टेसनों आदि पर घूमती पागल महिलाओं की नियति तो और भी दर्दनाक होती है। कुछ नीच लोग ऐसी महिलाओं को गर्भवती भी बना देते हैं। ............. पागलपन एक प्रकार का मनोरोग है। इस रोग का इलाज करने वाले चिकित्सक भी लगभग हर शहर में आपको मिल जायेंगे। मगर चुकी इस रोग का इलाज थोड़ा जटिल होता है तथा काफी लम्बा होता है, अतः बहुत सारे लोग बीमार व्यक्ति का सही ढंग से इलाज नहीं करा पाते। ............ अंत में मुझे सिर्फ इतना हीं कहना है कि पागल व्यक्तिओं के दर्द को हम महसूस करें और उन्हें मनो चिकित्सकों तक पहुँचाने में मदत करें। 
पहले दामिनी...फिर गुड़िया...फिर आने वाले कल में ...कोई और ?चाणक्य ने कहा है-यदि राजा अपने देश में...राज्य की रक्षा...प्रजा की सुरक्षा...प्रजा पर होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाने में...और दोषियों को दंड देने में असमर्थ हो...तो प्रजा को स्वयं के हित के लिए किसी कुशल राजा की पुनः नियुक्ति के विषय में भी विचार कर लेना चाहिए !
बिहार के छात्र-छात्राओ मे प्रतिभा की कमी नही है बिहार के युवा पिढी आज कठीन से कठीन मंजील को हासिल कर रहे है । ऐ वीरो की धरती है यहाँ कइ महान पुरुष जन्म भुमि है यही बिहार का बोद्धगया मे बुध्द भगवान ज्ञान प्राप्त हुइ थी ऐ मौर्य की धरती है । जिस तरह आज बिहार के स्टुडेण्ट आर्थीक कमजोरीयो को झेलते हुए भी अपनी मंजील को सकार कर है ऐ काबिले तारिफ है । आज भी हरेक जगह बिहार के स्टुडेण्ट अपने मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है हमेशा हरेक प्रतियोगताओ मे बिहारी स्टुडेण्ट अपना परचम लहराते है । दुख इस बात की है हम कुछ करना चाहते है पर उस चीज की सुविधा मिल नही पाती हमारे पास सुचनाओ की कमी है न ऐसे संस्थाना है बिहार मे जो आज के युवा वर्ग के सपनो को उडान दे , बिहार मे न ऐसा कोइ प्लेटफाँर्म है जहा हम अपनी टैलेंट को दिखा सके यही पर मार खा जाते है । यही सब वजह की हम आज भी पिछडे है ,जरूरत है युवाओ को मौका देने की ,उनकी प्रतिभावो को मंच देने की ताकी वे देश दुनिया मे अपना परचम लहरा सेकेँ इनसब बतो पर पहल करने की जरुरत है । 

मुझे शक उन मर्दो के मर्दानगी पे होता है जो एक कुवारी लडकी के पेट मे पलने के लिए बच्चे को छोड जाते है ...आखिर क्या कूसुर है वो नवजात बच्चे का जो कुडे कचडे फेके जाते है और उन्ही कोइ उठाने के लिए तैयार नही होता है । कितना अजिब लगता है न सुन कर कि आज मोहले के कुडे के डबे मे एक बच्चा मिला आखिर क्या इसकी माँ को जरा सा भी ममता न आइ अपने बच्चो पर आखिरी क्यो फेकी कुडे? मे क्या वजह था जो मजबुर हुइ बहुत सारे सवाल उठते है। आप क्या कहेगे ?
युवाओ ने अपनी इच्छा जाहीर किया और कहा हमेँ तो ऐसा स्मार्टफोन एप चाहीए जिससे हम अपनी गर्लफ्रेंड को असानी से ट्रैक कर सके । ताकी पता चले वह कहाँ कहाँ और किस तरह के जगह पर जाती है । पहली बार एनडीटिवी ने एक रियलिटी शो शुरू किया जहाँ युवाओ ने ग्रर्लफ्रेंड ट्रैकिग जैसी एप कि मांग की । सायद ऐ एप आने के बाद हम अपनी गर्लफ्रेंड के हरेक गतिविधी पर ध्यान रहेगा और जब भी वह अपने ब्याफ्रेंड को धोखा देने कि कोशिश करेगी और पकडी जाऐगी । इस शो शुरू करने का मकशद यह था कि एप यूजर्स कि जरुरतो के एप बनाया जाए . जिससे स्मार्टफोन के प्रति रुची बढे , नोकिया के डायरेक्टर आँफ डवलपर एक्सपीरिंस गेराँर्ड रेगो के मुताबित ऐ मुहिम काफी सफल रहा । और उमिद किया जाता है गर्लफ्रेंड ट्रैकिंग एप बहुत जल्द आपके स्मार्टफोन मे होगा
मेरे ब्लाग पर आप सबका हार्दिक स्वागत है, शीघ्र ही नयी पोस्ट प्रस्तुत करुंगा साहित्‍य और संगीत दोनों ही आत्‍मा को शुद्ध करते हैं, आपको अनुशासित रखते हैं और आपको भावनात्‍मक रूप से मजबूती भी प्रदान करते हैं । आइए, ऐसे ही कुछ विचार मेरे साथ बांट कर देखिए, अच्‍छा लगे तो ठीक, अच्‍छा न लगे तो आपकी इच्‍छा ।