घर हो या बाहर हमेशा महिला को ही गलत कहा जाता है.सब लोग गलत नजर से देखते है नारी के प्रती बिल्कुल गलत नजरिया रखते है लोग .समय बदल गया है लेकिन पुरूषोँ की मानसिकता अभी भी नही बदली है. सडक पर कोई घटना घटित हो जाये तो सबसे पहले महिलाओँ के चरित्र पर ही सवाल उठाये जाते हैँ . कार्यस्थल पर अगर कोई महिला सहिला सहकर्मी उत्पीडन की शिकायत करती है तो उसे ही शक की निगाहोँ से देखा जाने लगता है . जन्म से ही लडकियोँ को मर्यादा मेँ रहने की सीख दी जाती है । इसके खिलाफ अगर महिला आवाज उठाती है तो उसे ही गुनहगार मान लिया जाता है । इन सब के बावजुद महिलाएं हर क्षेत्र मेँ अच्छा प्रदर्शन कर रही है । अब समाज को भी अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है तभी हम एक सुन्दर समाज बना सकते है
भारतीय संविधान मेँ जिस धर्मनिरपेक्षता शब्द की व्याख्या है उसका मूल अर्थ सर्व धर्म समभाव के रूप मे ग्रहण किया गया था . अंगरेजों ने हमारे देश को एक बार बाटा ,लेकिन हमारे ये स्वधोषित धर्मनिरपेक्ष राजनेता हर रोज इस गौरवमयी राष्ट्र को बांट रहे हैं . क्या आज अल्पसंख्योकोँ के क्लयाण के नाम पर ओछी राजनीति एक अच्छे भले सद्भावपुर्ण वातावरण को समाप्त करने का काम नही कर रही है ? अब वो समय आ गया है जब इसतरह की तुष्टीकरण से अल्यसंख्यक समुदाय के लोगों को सोचने पर मजबूर होना चाहिए कि क्या उन्हेँ सिर्फ वोट बैंक बन कर रहना है या सम्मानित नागरिक . स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष दलोँ को भी देश की जनता को बताना होगा की आखिर कब तक तुष्टीकरण की राजनीति के नाम पर देश हित सुली पर लटकता रहेगा ? धर्मनिरपेक्षता की आड मे ओछी राजनीति करनेवाले राजनीतिज्ञ हजारो वर्ष पुरानी सभ्यता को मिटाने का पड्यंत्र रच रहे है
फेसबुक बनाने वालेँ ने भी कभी नही सोचा होगा कि इस सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए भी कई गलत काम हो सकता है । आंकडो के मुताबित देखेँ तो आज सेक्स रिलेटेड क्राइम मे सोशल नेटर्किंग साइट भी अहम रोल अदा कर रहा है । आज कल फेक अइडेंटिटी के जरिए एक दुसरे के करिब आना और फिर उनकी पर्सनल लाईफ के महत्वपुर्ण पहलुओँ और तस्वीरोँ को फेसबुक पर डाल देना आम बात हो गई है । कुछ मामलोँ मेँ तो साइबर सेल की सक्रियता के कारण तो अपराधी पकड लिए जाते है .लेकीन ज्यादातर मामलोँ मेँ अपराधी पकड से दुर हो जाते है । वही , बदनाम होने के डर से पीडित भी खुद को दुनिया के सामने नही आते ।नतिजा ऐसे अपराधियोँ का हौशला बढता जाता है और फिर नए शिकार की तलाश मे लग जाते है । कहने का मतलब ऐ है की इंटरनेट के इस्तमाल मेँ हमे सर्तक रहने की जरुरत है .सोशल नेटवर्किंग साइट हो या फिर अन्य मीडियम इंटरनेट पर फ्रेँडसिप करने से पहले हमेँ दुसरे व्यक्ति का प्रोफाइल की पूरी जानकारी होनी चाहिए । पर्सनल लाइफ की महत्वपुर्ण चीँजो को खुलासा करने से पहले भी हमेँ सर्तक रहना चाहिए ।इसके बावजुद भी अगर आप साइबर क्राइम के शिकार हो गए हो तो सइबर सेल का मदद लेँ .
किसी भी धार्मिक संप्रदाय का जन्म ईश्वर की प्राप्ति के एक मार्ग के रूप
में होता है. मगर आदमी अपनी कलुषता के कारण अपने सम्प्रदाय अथवा धर्म को
दंगे जैसे कृत्य से कलंकित करने का गुनाह करता है. मेरे कुछ सबसे
अच्छे दोस्त मुस्लिम हैं और मैं कभी उनका अहित सोच
भी नहीं सकता और वे भी मेरे लिए हर त्याग करने को सदा तत्पर रहते हैं.
………… प्रशासन को चाहिए की दंगाइयों को अपराधी मानते हुवे उन्हें शीघ्र
नियंत्रित करे.हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दंगे में जिनका खून बहता
है वे सभी अमूमन निर्दोष लोग ही होते हैं. दंगो में बच्चे, बूढ़े और दूध
पिलाती महिलाएं हिंसा की ग्रास बनती हैं. और किसी निर्दोष का लहू बहाना
किसी भी धर्म में पाप हीं बताया गया है. सिर्फ इसलिए की कोई व्यक्ति
दुसरे धर्म का है, हम उसकी हत्या कर दें यह कहाँ का इन्साफ हो सकता है ? सभी से मेरा यही निवेदन है कि कोई भी दंगा में शामिल न हो तथा यदि
कोई दंगा फैला रहा है तो उसे आप पूरी ताकत से रोकें। एक दंगाई न तो
हिन्दू होता है, न मुसलमान होता है, उसकी अवस्था एक पागल कुत्ते की हो
जाती है जो मानवता को काट खाने के लिए दौड़ता है.
ज्यादातर लोगोँ को लगता है कि जबसे इंटरनेट और फेसबुक का जमाना आया है , तबसे किताबोँ की वकत कम हो गयी है , लेकिन किताबोँ का तो अपना ही मजा है . अपनी ही सहूलियत है . और अपने ही लाभ भी है . किताबे सिर्फ जानकारी नही देती ,किताबे सिर्फ मनोरंजन नही करती . वे सांस्कारित भी करती है , जीने का सलीका भी सिखाती है और रिश्ते के मर्म को महसूसने की अदा भी .इसलिए किताबोँ की वकत कभी भी कम न होगा . वे हमेशा प्रासंगिक बनी रहेँगी और बेहतर समाज के निर्माण के लिए मानवीयता को प्रेरित करती है रहेंगी .गांधी जी कहा करते थे ,अ हाउस विदाउट बुक इज अ हाउस विदाउट विंडो . किताबेँ आपको सोचने और समझने को प्रेरित करती है . मनुष्य मेँ रचनात्मक का बोध तो किताबेँ ही पैदा कर सकती हैँ .विविधतापूर्ण संसार को समझने व जानने का बेहतर जरिया किताबेँ ही है .
इतिहास में बहुत सारे ऐसे मौके आये जब बाहरी लोगों ने भारत , बिहार पर आक्रमण किया लेकिन उस समय भी भोजपुरी संगीत पर ऐसे संकट के बादल नहीं मंडराए जैसे आज कल के कुछ स्वार्थी संगीतकारों, गायकों और फनकारों की वजह से आया है। समूचा भोजपुरी समाज आज के उन गीतकारों, गायकों और उन फनकारों से एक विनती करता है। हे लेखक वीरों, माँ सरस्वती ने तुम्हारी कलम में वो ताकत दी है जिसे दुनिया सलाम कराती है,क्यों उसका इस्तेमाल असभ्य और अशिष्ट गीतों के लिए कर रहे हो, भोजपुरिया समाज की सभ्यता और संस्कृति को पुरे विश्व में गीतों के जरिये दिखाने का जिम्मा आपका है। ऐसा क्या हो गया कि आज आपकी कलम क्यों केवल समियाना, लहंगा, मीटर और चोली में अटक कर रह गयी, क्यों आपके गीतों का हीरो एक बदमिजाज और बदतमीज आशिक है ? आप वीरों की गाथाओं को क्यों भूल गए, आपके गीतों के नायक वीर बाँकुड़ा बाबू कुंवर सिंह, देशरत्न राजेंद्र बाबु भिखारी ठाकुर मंगल पाण्डेय और चितु पाण्डेय क्यों नहीं है ? भगवान के लिए अपने गीतों में नायकों की गाथाओं का उल्लेख करें।
आपने भी पढ़ा होगा इस तरह की पंक्तियों को, कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, एक बिहारी सौ पे भारी, जय मराठा, गर्व से कहो हम भारतीय हैं, आदि, आदि। ............... अब यह सोंचने की बात है कि यदि कोई कहेगा की मैं सौ पर भारी हूँ, तो कोई दूसरा ऐसा तो कह हीं सकता है न, कि भैया, मैं तो हज़ार पर भारी हूँ। पुनः किसी हिन्दू को यदि हिन्दू होने पर गर्व है, तो किसी को मुस्लिम या इसाई या सिख होने पर भी गर्व होना कोई अचरज की बात नहीं होगी। .............. मेरा कहना सिर्फ यह है की हमने धरती को और मनुष्यों को न जाने कितने टुकड़ों में बाँट रखा है। जबकि यहबाँटना हकीक़त में सम्भव हीं नहीं है। पूरी धरती एक है और पूरी मनुष्यता एक है। ............. यदि हमें गर्व हीं करना है तो दो बातों का गर्व हम कर सकते हैं। पहला यह कि हम इस सुन्दरता से परिपूर्ण धरती के वासी हैं, और दूसरा यह, कि हम इस धरती के सबसे विकसित प्राणी मनुष्य की संतान हैं। ............ हमारेशास्त्रों ने इसीलिए हजारों वर्षपहले हीं "वसुधैव कुटुम्बकम" की बात की थी।
लागातार विरोध आन्दोलन के बावजूद महिलाओँ व युवतियो के खिलाफ हिंसा व दुष्कर्म की घटनाएं घट रही है . हमारे समाज को क्या हो गया है ? क्या लोगो की बुध्दी भ्रष्ट हो गई हो क्यो वे चोचना भुल गय है रिश्ते नाते भुल गय है या वे ऐ भुल गय है की वे भारत के उन महान व्यक्तीयो के धरती पे निवास करते है जहाँ ...बुध्द , माहाविर ,नानक ,कबिर ,दयानंद ,विवेकान्द एवम रामकृष्ण समेत अन्य महानपुरूषो की जन्मस्थल पर हम निवास करते है क्या हम यह भुल गय है? या इनके उपदेश का असर हमारे समाज पर नही रह गया ? कई सवाल है । रावण बध को उत्सुकता के साथ देखनेवाली आंखे क्या पथर हो गयी है? क्या हमारे अन्दर के मानवीय विचार और संवेदना सुन्य हो गइ है ? सामुहीक सोच ,सामुहीक पहल के साथ सोचना होगा समाज को क्या धोखा ,विश्वाघात और भ्रष्ट तौर तरिके से अर्जित धन और आवारा पूंजी का प्रभाव इसके लिए जिम्मेवार नही है? नही तो क्या कारण है कि देवी देवताओँ और माता की पुजा -अर्चना करने वाले हाथ हिंसा और दुष्कर्म करने के लिए बढ जाते है

सड़कों पर हम अक्सर पागलों को घूमते देखते हैं। न
उन्हें कपड़े की सुध रहती है, न वातावरण की। अपनी हीं दुनिया में खोये
रहते है। अजीबोगरीब हरकतें भी करते हैं। अपने आप से हीं बातें करते रहते
हैं। कुछ लोग उन्हें देख कर हँसते भी हैं, पर कुछ लोग उनकी बदनसीब ज़िन्दगी
के ऊपर तरस भी खाते हैं। कुछ इनपर ध्यान हीं नहीं देते और बच कर निकल जाते
हैं। ............ इन पागलों को अनेक रूपों में आपने भी जरुर देखा होगा।
ये पागल शायद कभी चैन में नहीं रहते। सतत बेचैनी इन्हें
घेरे रहती है। इधर उधर भटकते रहना उनकी नियति हो जाती है। सड़े गले जूठन
को भी वे खा लेते हैं। गर्मी में शरीर पर कम्बल लादे और जाड़े में
नंग-धड़ंग ठिठुरते भी हम इन्हें देख सकते हैं। कुछ तो पीठ पर गंदे-संदे
बेकार की चीजों का बड़ा सा भारी गठ्ठर भी लिए चलते हैं। ............ पागल
आदमी का चित्त चौबीसों घंटे सिर्फ दर्द हीं झेलता रहता है। दुभाग्य यह है
कि अपने हीं दर्द की इन्हें सुध नहीं रहती। अपने दर्द की यदि उन्हें सुध
होती तो वे भी डाक्टरों की पास जाते और डाक्टर से कहते की मेरा दर्द मिटाओ।
किन्तु वे कभी नहीं जान पाते कि उन्हें डाक्टर की जरुरत भी है। यही एक
मात्र ऐसी बीमारी है, जिसमें बीमार को अपनी बीमारी का हीं होश नहीं रहता।
इस लिए मैं इस बीमारी को सबसे बड़ी बीमारी मानती हूँ। कैंसर और एड्स से भी
ज्यादा ख़राब। ............ पागलपन को कुछ लोग एक रहस्य मान बैठते हैं।
किन्तु आज यह पूरी तरह ज्ञात हो चुका है कि पागलपन भी दूसरी बिमारियों की
तरह एक रोग है, जिसका सफलता पूर्वक इलाज हो सकता है। ........... सड़क पर
जो पागल घूमते दीखते हैं, दरअसल उनके परिवार वाले उनका इलाज नहीं कराते
बल्कि उन्हें यूं हीं आवारा पशु की तरह छोड़ देते हैं। सड़कों पर और
स्टेसनों आदि पर घूमती पागल महिलाओं की नियति तो और भी दर्दनाक होती है।
कुछ नीच लोग ऐसी महिलाओं को गर्भवती भी बना देते हैं। ............. पागलपन
एक प्रकार का मनोरोग है। इस रोग का इलाज करने वाले चिकित्सक भी लगभग हर
शहर में आपको मिल जायेंगे। मगर चुकी इस रोग का इलाज थोड़ा जटिल होता है तथा
काफी लम्बा होता है, अतः बहुत सारे लोग बीमार व्यक्ति का सही ढंग से इलाज
नहीं करा पाते। ............ अंत में मुझे सिर्फ इतना हीं कहना है कि पागल
व्यक्तिओं के दर्द को हम महसूस करें और उन्हें मनो चिकित्सकों तक पहुँचाने
में मदत करें।
पहले दामिनी...फिर गुड़िया...फिर आने वाले कल में ...कोई और ?चाणक्य ने कहा है-यदि राजा अपने देश में...राज्य की रक्षा...प्रजा की सुरक्षा...प्रजा पर होने वाले अत्याचारों पर अंकुश लगाने में...और दोषियों को दंड देने में असमर्थ हो...तो प्रजा को स्वयं के हित के लिए किसी कुशल राजा की पुनः नियुक्ति के विषय में भी विचार कर लेना चाहिए !
बिहार के छात्र-छात्राओ मे प्रतिभा की कमी नही है बिहार के युवा पिढी आज कठीन से कठीन मंजील को हासिल कर रहे है । ऐ वीरो की धरती है यहाँ कइ महान पुरुष जन्म भुमि है यही बिहार का बोद्धगया मे बुध्द भगवान ज्ञान प्राप्त हुइ थी ऐ मौर्य की धरती है । जिस तरह आज बिहार के स्टुडेण्ट आर्थीक कमजोरीयो को झेलते हुए भी अपनी मंजील को सकार कर है ऐ काबिले तारिफ है । आज भी हरेक जगह बिहार के स्टुडेण्ट अपने मेहनत और लगन के लिए जाने जाते है हमेशा हरेक प्रतियोगताओ मे बिहारी स्टुडेण्ट अपना परचम लहराते है । दुख इस बात की है हम कुछ करना चाहते है पर उस चीज की सुविधा मिल नही पाती हमारे पास सुचनाओ की कमी है न ऐसे संस्थाना है बिहार मे जो आज के युवा वर्ग के सपनो को उडान दे , बिहार मे न ऐसा कोइ प्लेटफाँर्म है जहा हम अपनी टैलेंट को दिखा सके यही पर मार खा जाते है । यही सब वजह की हम आज भी पिछडे है ,जरूरत है युवाओ को मौका देने की ,उनकी प्रतिभावो को मंच देने की ताकी वे देश दुनिया मे अपना परचम लहरा सेकेँ इनसब बतो पर पहल करने की जरुरत है ।
मुझे शक उन मर्दो के मर्दानगी पे होता है जो एक कुवारी लडकी के पेट मे पलने के लिए बच्चे को छोड जाते है ...आखिर क्या कूसुर है वो नवजात बच्चे का जो कुडे कचडे फेके जाते है और उन्ही कोइ उठाने के लिए तैयार नही होता है । कितना अजिब लगता है न सुन कर कि आज मोहले के कुडे के डबे मे एक बच्चा मिला आखिर क्या इसकी माँ को जरा सा भी ममता न आइ अपने बच्चो पर आखिरी क्यो फेकी कुडे? मे क्या वजह था जो मजबुर हुइ बहुत सारे सवाल उठते है। आप क्या कहेगे ?
युवाओ ने अपनी इच्छा जाहीर किया और कहा हमेँ तो ऐसा स्मार्टफोन एप चाहीए जिससे हम अपनी गर्लफ्रेंड को असानी से ट्रैक कर सके । ताकी पता चले वह कहाँ कहाँ और किस तरह के जगह पर जाती है । पहली बार एनडीटिवी ने एक रियलिटी शो शुरू किया जहाँ युवाओ ने ग्रर्लफ्रेंड ट्रैकिग जैसी एप कि मांग की । सायद ऐ एप आने के बाद हम अपनी गर्लफ्रेंड के हरेक गतिविधी पर ध्यान रहेगा और जब भी वह अपने ब्याफ्रेंड को धोखा देने कि कोशिश करेगी और पकडी जाऐगी । इस शो शुरू करने का मकशद यह था कि एप यूजर्स कि जरुरतो के एप बनाया जाए . जिससे स्मार्टफोन के प्रति रुची बढे , नोकिया के डायरेक्टर आँफ डवलपर एक्सपीरिंस गेराँर्ड रेगो के मुताबित ऐ मुहिम काफी सफल रहा । और उमिद किया जाता है गर्लफ्रेंड ट्रैकिंग एप बहुत जल्द आपके स्मार्टफोन मे होगा
मेरे ब्लाग पर आप सबका हार्दिक स्वागत है, शीघ्र ही नयी पोस्ट प्रस्तुत करुंगा साहित्य और संगीत दोनों ही आत्मा को शुद्ध करते हैं, आपको अनुशासित रखते हैं और आपको भावनात्मक रूप से मजबूती भी प्रदान करते हैं । आइए, ऐसे ही कुछ विचार मेरे साथ बांट कर देखिए, अच्छा लगे तो ठीक, अच्छा न लगे तो आपकी इच्छा ।